डीयू छात्रसंघ चुनावों के चार बड़े संदेश

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दिल्ली यूनिवर्सिटी से आए चुनाव परिणामों को कतई हल्के में नहीं लिया जा सकता। इसकी ढेरों वजहें हैं। सबसे बड़ी यह कि इस चुनाव में हिस्सा लेने वाले एक लाख स्टूडेंट वोटर में ज्यादातर देश के अलग-अलग हिस्से से ताल्लुक रखते हैं। डीयू के चुनाव परिणाम को शुरू से ही यूथ का ओपिनियन पोल समझा जाता है। बुधवार को आए परिणामों को टटोलें तो यह पीएम मोदी की अगुवाई में बढ़ रही बीजेपी के लिए एक वेक-अप कॉल है। कांग्रेस फिर से अपने ‘अच्छे दिनों’ की ओर कदम बढ़ाती दिख रही है, क्योंकि इससे पहले पंजाब, राजस्थान और असम यूनिवर्सिटी में हुए छात्र संघ चुनावों में भी एबीवीपी को उम्मीद के मुताबिक जीत नहीं मिली। यह सब कांग्रेस के पक्ष में जाता है। डीयू छात्र संघ चुनाव के परिणामों में छिपे 4 संदेश कुछ यह इशारा करते हैं।

1- कैंपस में राजनीति का ओवरडोज मंजूर नहीं

इस चुनाव परिणाम को कैंपस में राजनीति के ओवरडोज के खिलाफ भी समझा जा सकता है। पिछले कुछ महीनों में राष्ट्रवाद और दूसरे ऐसे मुद्दों पर टकराव देखे गए। दिल्ली यूनिवर्सिटी ऐसी कई घटनाओं को लेकर ही सुर्खियों में रही। इन घटनाओं में हर बार एबीवीपी का नाम आया। इस हार से एबीवीपी को सख्त संदेश मिला है। चुनाव विश्लेषक अंबरीष त्यागी ने कहा कि दिल्ली यूनिवर्सिटी को बहुत बड़ा मापदंड मान कर चलता हूं। थोपा राष्ट्रवाद और मॉरल पुलिसिंग जैसी बातें शार्ट टर्म में भले माहौल बनाएं लेकिन लॉन्ग टर्म में ऐसे मुद्दे युवाओं पर असर नहीं डालते। यह संदेश सबके लिए है

2-पीएम मोदी ने भांप लिया था रिजल्ट?

क्या पीएम मोदी ने डीयू चुनाव परिणामों को भांप लिया था। स्वामी विवेकानंद की शिकागो स्पीच के 125 साल पूरा होने के मौके पर दिए उनके भाषण में इसके संकेत दिखाई देते हैं। पीएम ने कहा था कि नारे लगाकर देशभक्ति साबित नहीं हो सकती है। मॉरल पुलिसिंग की इजाजत समाज भी नहीं देता है। उन्होंने न्यू इंडिया में उदार युवा की तस्वीर पेश की थी। इस हार के बाद यह सवाल भी उठ रहा है कि क्या आने वाले दिनों में एबीवीपी भी अपने एप्रोच में बदलाव लाएगी? यह भी पूछा जाने लगा है कि क्या विपक्ष भी इन परिणाम के बाद अपने अजेंडे में युवाओं के मुद्दे रखेगा।

3- नोटा को मिले वोट का बड़ा संदेश

पहले जेएनयू और फिर दिल्ली यूनिवर्सिटी में नोटा पर हुई बेतहाशा वोटिंग एक अलग ही ट्रेंड को सामने ला रहा है। नोटा पर यही ट्रेंड जारी रहा तो आगामी चुनावों में वह सभी उम्मीदवारों से अधिक वोट पा सकता है। यह मौजूदा दौर में हर तरह की राजनीति खासतौर पर ढर्रे की राजनीति करने वालों के लिए संकेत है। नोटा पर युवाओं का भरोसा जताता है कि राजनीति में उनकी दिलचस्पी घटी है या संभवत: वह विशेष तरह की राजनीति को स्वीकार नहीं करना चाहते।

4- ‘आप’ का क्या होगा जनाबे आली

चुनाव विश्लेषक यशवंत देशमुख के अनुसार, भले यह चुनाव परिणाम कैंपस का है। लेकिन इससे बीजेपी के साथ ही आम आदमी पार्टी की भी चिंता बढ़ गई होगी। उन्होंने कहा कि आम आदमी पार्टी ने दिल्ली में पैर जमाने के बाद दूसरे राज्यों में कमजोर कांग्रेस के विकल्प के रूप में ही खुद को पेश किया। इस के आखिर में होने जा रहे गुजरात विस चुनावों में भी वह अपने प्रत्याशी उतारेगी। ऐसे में अगर कांग्रेस या कांग्रेस का संगठन मजबूत होगा तो इसका खामियाजा आप को हो सकता है। उन्होंने बवाना में संपन्न हुए विधानसभा चुनाव की भी मिसाल दी जहां कांग्रेस ने 20 फीसदी तक वोट अपना बढ़ाया है।

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